Posts Tagged ‘चेतनाकी उडान’

उल्जन और उपाय.

हरेक उल्जन को सुल्जानेमें हम एक और नयी समस्या/उल्जन खड़ी कर देते हैं. परिणामस्वरूप हम पाते हैं सिर्फ धोखा,फरेब,उपेक्षा और अपने स्वके प्रति निम्नताका भाव जो न सिर्फ हमको मगर हमारे नाज्दिकियोंको भी ब्लानिसे भर देता हैं.

तो ये पहेली को सुल्जानेके लिए हमें हमारे अस्तित्वकी गहेरिमें जाना पड़ेगा और एक समजका अविष्कार करना पड़ेगा ताकि हम तथ्योंको भलीभांति समज सके और एक नया आलोक प्रकाशित हो जाएँ जैसेकी सुर्यकी पहली किरण जिस्मेंकी जीवन हैं. तब आदमी भर जाता हैं पुर्णतासे और महसूस होताहें की अपने अस्तीत्वका होनाही स्वयं आनंदमय हैं.

भीतरी सम्पदा

कोई कितना भी सुन्दर क्यों न हों , हम क्यों हमारी भीतरी सम्पदा खतरेमे डाले.
बाजारसे तो सभी गुजरते है , हम क्यों खरीदार बनके अपना होशो-हवास को बेहोशिमें डाले.
यूँ तो हर नज़ारा कुदरते करिश्मा है मगर मजबूर है की हम हमारी सोच डालके भला बुरा देख लेते हैं .
काश मेरी तवज्जु एक पलके लिए भी उनसे अलग न होती, तो उनका नूर ही नूर हर जगह नज़र आता.
उड़नेके लिए पंखतो दे दिए मगर मैं परवान चड़ा न सका वरना कौन जमीं पर पड़े पड़े पंख फड फडाता
आस्माको देखके उनकी बुलंदी बयां नहीं हो सकती , फिरभी जबभी कभी मौका मिलातो जमीं के फूल-पोधोंको सहेला लेता हूँ. ताकि एहसास हो जाएकि वही बुलंदी और करिश्माए कुदरत जमीं पर भी मेरी राह देखते रेहते है.