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कुद्रतका करिश्मा

मेरी चेतनाको उड्नेके लिए पंख तो दे दिए मगर में परवान न चड़ा सका वर्ना
कौन जमिनपर पड़े पड़े खाली खाली पंख फड फडाता ./

आस्मानको देखके उनकीं बुलंदी बयां नहीं हो सकती फिर भी मेरी चेतनाको जब भी
मौका मिलता है तो जमीनके फुल-पोधोको सहेला लेता हूँ ताकि एहसास हो जाये की
वही बुलंदी और करिश्माए कुदरत जमीं पर भी मेरी राह देखा करते है.